क्या है नेहरू-लियाकत समझौता जिसकी विफलता बनी नागरिकता कानून की बुनियाद


नई दिल्ली, 10 दिसम्बर (इंट): लोकसभा में सोमवार को नागरिकता संशोधन बिल 2019 की बहस के दौरान सदन में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नेहरू-लियाकत समझौते को इसकी वजह बताई। 1950 में लागू हुए इस समझौते के बारे में उन्होंने कई सवाल भी उठाए। आइए जानें-क्या है ये समझौता और क्यों किया गया था। ये वो दौर था जब भारत और पाकिस्तान विभाजन का दंश झेल रहे थे। सैकड़ों दंगा पीड़ित लोग इस सीमा से उस सीमा को पार करते रहते थे। वो वक्तथा नागरिकों की पहचान और उन्हें स्थायित्व देने का, इसी समझौते के चलते देश में अल्पसंख्यक आयोग बनाए गए थे, लेकिन अमित शाह ने कहा कि कभी भी इस समझौते का पूरा पालन नहीं हुआ। बता दें कि दिल्ली के गवर्नर्मेंट हाउस में दोनों भारत-पाकिस्तान देशों के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और लियाकत अली खान ने हस्ताक्षर किए थे। समझौते के तहत दोनों देशों ने अपने-अपने देश में अल्पसंख्यक आयोग गठित किए। इस समझौते के लिए दोनों देशों के अधिकारियों के बीच दिगी में छह दिनों तक बातचीत हुई थी. इसे दिगी पैक्ट  के नाम से भी जाना जाता है। इस समझौते का विरोध करते हुए नेहरू सरकार के उद्योगमंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस्तीफा दे दिया था। मुखर्जी तब हिन्दू महासभा के नेता थे। उन्होंने पैक्ट को मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाला बताया था।
क्या है विधेयक
नागरिकता संशोधन विधेयक का उद्देश्य 6 समुदायों-हिन्दू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध तथा पारसी-के उन लोगों को भारतीय नागरिकता प्रदान करना है जो अफगानिस्तान,पाकिस्तान व बंगलादेश से आए हैं। नए विधेयक के तहत अब भारत की नागरिकता पाने के लिए 11 साल की बजाय 6 साल तक देश में रहना अनिवार्य होगा।
कौन है विरोध में
कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, टी.एम.सी, समाजवादी पार्टी, डी.एम.के., वामदल, असम गण परिषद तथा राष्ट्रीय जनता दल
कौन है पक्ष में
भाजपा व सहयोगी दल, अन्नाद्रमुक।
कौन हैं अवैध प्रवासी
नागरिकता कानून, 1955 के अनुसार अवैध प्रवासियों को भारत की नागरिकता नहीं मिल सकती है। इस कानून के तहत उन लोगाें को अवैध प्रवासी माना गया है जो भारत में वैध यात्रा दस्तावेज़ जैसे पासपोर्ट और वीज़ा के बगैर घुस आए हाें अथवा वैध दस्तावेज़ में उल्लिखित अवधि से ज्यादा समय तक यहां रुक जाएं। 
अवैध प्रवासियों के लिए क्या है प्रावधान 
अवैध प्रवासियों को या तो जेल में रखा जा सकता है या फिर विदेशी अधिनियम, 1946 और पासपोर्ट अधिनियम 1920 के तहत वापिस उनके देश भेजा जा सकता है परंतु केन्द्र सरकार ने वर्ष 2015 और 2016 में उपरोक्त 1946 और 1920 के कानूनों में संशोधन करके अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बंगलादेश से आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई लोगों को छूट दे दी है। इसके अनुसार इन धर्मों से संबंध रखने वाले लोग यदि भारत में वैध दस्तोवेज़ोें के बिना भी रहते हैं तो न तो उन्हें जेल में डाला जाएगा और न ही निर्वासित किया जाएगा।
आखिर क्या है विवाद
विपक्ष का सबसे बड़ा विरोध यह है कि इसमें खासतौर पर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया गया है उनका तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद-14 का उल्लंघन है जो समानता के अधिकार की बात करता है।
पूर्वोत्तर के लोग विरोध में क्यों
पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक बड़े वर्ग का कहना है कि अगर नागरिकता संशोधन विधेयक को लागू किया जाता है तो पूर्वोत्तर के मूल लोगों के सामने पहचान और आजीविका का संकट पैदा हो जाएगा।
ये हैं समझौते के खास बिंदु
(1) प्रवासियों को ट्रांजिट के दौरान सुरक्षा दी जाएगी। वे अपनी बची हुई सम्पत्ति को बेचने के लिए सुरक्षित वापस आ-जा सकते हैं।
(2) जिन महिलाओें का अपहरण किया गया है, उन्हें वापस परिवार के पास भेजा जाएगा। अवैध तरीके से कब्जाई गई अल्पसंख्यकों की सम्पत्ति उन्हें लौटाई जाएगी।
(3) जबरदस्ती धर्म परिवर्तन अवैध होगा, अल्पसंख्यकों को बराबरी और सुरक्षा के अधिकार दिए जाएंगे. दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ किसी भी तरह का कुप्रचार नहीं चलने दिया जाएगा।
(4) दोनों देश युद्ध को भड़काने वाले और किसी देश की अखंडता पर सवाल खड़ा करने वाले प्रचार को बढ़ावा नहीं देंगे।