क्षमा प्रार्थना


साहिबो, हम आपसे क्षमा चाहते हैं कि न चाहते हुए भी हमें अपनी कुर्सी को जिन्दा रखने के लिए, अपनी टोपी को ऊंचा रखने के लिए आपके सामने हर बार चुनावों का बिगुल बजाने के बाद वायदों की बारात सजानी पड़ती है। पिछली बार बारात सजाई थी तो आप सब के लिए ‘अच्छे दिन आने’ का उपहार देने का वायदा किया था। आपने उम्मीदों के कनकौए उड़ाते हुए हमें विजय का आसमान भेंट कर दिया। इसके बाद हमने इनके हर भाषण का करतल ध्वनि से स्वागत करते हुए न जाने कितने पत्थर तबीयत से उछाले हमारे आसमान में कोई सुराख नहीं हो सका। 
हमने कवि दुष्यन्त के शे’यर के सार्थक न हो पाने की त्रासदी झेलते हुए अपने इर्द-गिर्द घिरते हुए बेकारी, बीमारी, गरीबी और कज़र्दारी के आसमान को अपना जान गले से लगा रहने दिया। अच्छे दिन आने की उम्मीद हमारे क्षितिज पर एक इन्द्रधनुष बनकर उभरी थी। लेकिन भ्रष्टाचार के अजगरों ने उस क्षितिज को निगल लिया, हम अपना टूटा हुआ इन्द्रधनुष कहां तलाशने जाते? लेकिन सुखद भविष्य के सपनों की बारात फिर सजने लगी। वायदों की तश्तरियों पर चार दिन की चांदनी और फिर अंधेरी रात के चिलगोज़े तो हमारी गलियों में तशरीफ लाये, नहीं आई तो वह क्षमा प्रार्थना नहीं आई, कि हम आपके लिए अच्छे दिनों का उपहार नहीं ला पाये। कतार में खड़ा आखिरी आदमी वहीं खड़ा-खड़ा प्रस्तर हो गया, ताकि उनसे उतना भी न पूछ सके कि ‘क्या हुआ तेरा वायदा?’
वायदे पूरे होने का, भ्रम लेकर ‘गिली गिली पाशा’ कहते हुए आंकड़ों के जादूगर हमारी गलियों में तशरीफ अवश्य लाए थे। उन्होंने अपनी तरक्की के सूचकांकों के आधारवर्ष बदल दिये, गणना प्रक्रिया बदल दी, लेकिन उनकी जादूगर मैण्ड्रैक्स जैसी लम्बी जादुई टोपी में से कोई तरक्की और खुशहाली का खरगोश न निकला। गज़ब खुदा का किसान अपने खेतों में भरपूर फसल उगाने के बावजूद फसल खरीदने और बेचने वाली रोगी मण्डियों के बाहर चौराहों पर फंदा लेकर अपने जीवन का अन्त करते रहे, और समय के शाहसवार उन्हें अपच का शिकार या किसी असाध्य रोगी से दु:खी होकर मर गया, बताते रहे। 
आंकड़ों के जादूगरों ने उनकी मौतों के रोज़नामचे बन्द कर दिये, क्योंकि यह सूची सुरसा की आंत की तरह लम्बी होती जा रही थी, और इससे पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा देने की घोषणाएं शर्मिन्दा हो रही थीं।
इन घोषणाओं ने कोई क्षमा प्रार्थना न की, हां वे रोज़नामचे बंद कर दिये गये ‘कि न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी’। जब अपनी गरीबी से जर्जर किसानों की मौतें बीमारी और गृह-कलह के खाते में चली गयीं, तो खाली खजाना भला उनसे क्षमा प्रार्थना के लिए आगे क्यों आता? फिर यह वक्त क्षमा प्रार्थना का नहीं था। फिर चुनावी बिगुल बज गया, फिर गद्दी संभाले रहने की अपनी कुर्सी बचाने की फिक्र माहौल पर तारी हो गई। अब ऐसा वक्त अपनी अक्षमता और असफलता के लिए क्षमा प्रार्थना का नहीं, चुनावी अखाड़े में कूद कर अपने भुजदण्ड फड़काने का होता है। भुजदण्ड फड़कते हैं, जब उसी चौराहे पर नये तोरणद्वार सजते हैं। चौराहा तो बदहाली से और भी पहाड़-सा हो गया है। 
वक्त क्षमा प्रार्थना का नहीं, इस चौराहे में से एक नई उम्मीदों भरी सुबह सी, वायदों की एक और बारात लेकर निकल जाने का था। ऐसे सजानी थी यह बारात कि बाद में उसे एक विजययात्रा में तबदील करते हुए देर न लगे। इसके बाद तो उसे उस शोभायात्रा में तबदील होना ही है, जिसका समय सारथी, आपको दो की जगह चार दे देने का वायदा करता है। ये वायदे टपोरशंखी न लगे, इसलिए इस बार इनके माथे पर ‘अच्छे दिन आने’ के मुकुट नहीं सजे। यहां एक और युगमन्त्र फूंका गया। इंतज़ार का केवल पांच साल और इंतज़ार का मन्त्र। लंगड़ा कर चलते हुए पैरों में ओजस्वी भाषण नये प्राण फूंक रहे हैं कि ‘हम होंगे कामयाब, एक दिन नहीं पूरे पांच साल बाद।’ तब से लंगड़ाते हुए एक सौ तीस करोड़ जोड़ी पांव तेज़ धावक बनकर दुनिया के सब देशों को पीछे छोड़ कर सबसे आगे हो जायेंगे। 
देश के किसान की आय दुगुनी हो जायेगी और उन्हें स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट लागू करने की मांग भी नहीं करनी पड़ेगी। देश का सकल घरेलू उत्पादन और आय आशातीत चौकड़ियां भरता हुआ पांच ट्रिलियन हो जायेगा। अरे, रोज़गार मांगते हुए कांपते अक्श हाथों, जब अर्थव्यवस्था का पैमाना इतना बड़ा हो जायेगा, तो भला तुम्हें रोज़गार मांगती कतारों में खड़ा होने की ज़रूरत ही क्या? रोज़गार तो तुम्हारे पीछे-पीछे गिड़गिड़ायेगा कि ‘आओ, मुझे अपने आगोश में समेट लो।’
साहबो, हमें इस नये युग की पहली छमाही के आंकड़ों से परेशान न करो कि जहां बेरोज़गारी की दर, भूख की तपिश, आर्थिक विकास की दौड़ की लड़खड़ाहट कुछ इस कद्र घिसटी कि जैसी पिछले चार दशक में नहीं देखी। अरे, यह आर्थिक गिरावट नहीं, आर्थिक सुस्ती है। जो गिर गया, उसे उठाना कठिन होता है। मान लिया। लेकिन यह तो क्षणिक सुस्ती है। हमें इसमें अपनी ओजस्वी भाषणों से चमकदार विदेश यात्राओं से चपलता की जान फूंकनी आती है। इसलिए हमसे इसे असफलता मान किसी क्षमा प्रार्थना की उम्मीद न कीजिये, केवल इंतज़ार कीजिये, वक्त बदलने का।