राजनीतिक असंतोष को जन्म दे सकती है आर्थिक मंदी


करीब छह साल पहले सत्ता में आए नरेंद्र मोदी और उनसे पहले के कुछ प्रधानमंत्रियों के बीच सबसे बड़ा अंतर क्या है? मोदी ने एक के बाद एक दो चुनाव जीते हैं। यह उपलब्धि जवाहर लाल नेहरू के बाद केवल इंदिरा गांधी के नाम दर्ज है। लेकिन, मोदी की खास बात कुछ और है। उन्होंने नेहरू और इंदिरा गांधी की ही तरह अपने इर्दगिर्द एक राष्ट्रीय सहमति बनाने में कामयाबी हासिल की है। इस आम सहमति में देश के सबसे बड़े उद्योगपति, बहुत से बुद्धिजीवी, पत्रकार और समाज की कई प्रतिष्ठित हस्तियों की भागीदारी है। इस भारतीय अभिजन टोली को मोदी ने विश्वास दिला दिया है कि वे ऐसे एकमात्र नेता हैं जो किसी भी अन्य नेता के म़ुकाबले राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों से भारत और दुनिया भर में फैले भारतीयों को सम्बोधित कर सकते हैं। इन सभी का मानना है कि लोग मोदी की बात सुनते हैं, और उस पर विश्वास करते हैं। मोदी की शख्सियत के आसपास विकसित हुई इस आम सहमति को पिछले दिनों एक गम्भीर झटका लगा है। इसकी शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के वक्तव्य से हुई थी, लेकिन चूंकि डा. मनमोहन सिंह कांग्रेस के नेता हैं इसलिए भाजपा के रणनीतिकारों ने उनकी बात को तिरस्कार से दरकिनार कर दिया। लेकिन, जैसे ही देश के प्रमुख उद्योगपति राहुल बजाज ने उसी आशय की बात सार्वजनिक मंच से कही, वैसे ही डा. मनमोहन सिंह की बात से जुड़ कर वह मोदी-केंद्रित आम सहमति के लिए नुकसानदेह बन गई। डा. मनमोहन सिंह को पूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री होने के नाते सार्वजनिक मंच से ऐसा कहना ही चाहिए था। लेकिन, गृह मंत्री अमित शाह के सामने राहुल बजाज ने जो कहा, वह एक नयी बात थी। एक उद्योगपति के नाते (जिसे सरकार के समर्थन और सहयोग की अक्सर ज़रूरत रहती है) उन्होंने जोखिम उठाया, और उनकी हिम्मत से सरकार थोड़ा ताज्जुब में पड़ गई। जो भी हो, सिंह और बजाज की टेक एक ही थी। उन्होंने अर्थव्यवस्था के संकट को सरकार की राजनीतिक और प्रशासनिक शैली से जोड़ दिया, और अलग-अलग ढंग से दिखाया कि अगर सरकार आलोचना की जुर्रत का जवाब संदेह करने, बदला लेने और दिमाग ठिकाने लगाने के रवैये से देगी तो आर्थिक संकट का निदान नहीं हो पाएगा। नतीजतन होगा यह कि अर्थव्यवस्था की समस्याओं को राजनीतिक घटनाक्रम से काट कर अलग रखने का सरकारी मंसूबा बहुत दिनों तक नहीं चल पाएगा। और जैसे ही ये दोनों आपस में मिले, वैसे ही एक मजबूत और प्रबल पार्टी, एक करिश्माई नेता और राष्ट्रवादी जन-गोलबंदी का औजार भी राजनीतिक ग्ऱाफ की गिरावट को नहीं रोक पाएगा। 
इसमें कोई शक नहीं रह गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय अभूतपूर्व संकट के दौर से गुज़र रही है। बहस केवल इस बात की है कि इस संकट की प्रकृति क्या है? क्या यह ‘स्लो डाउन’ यानी वृद्धि-दर की गिरावट है? या यह संकट गिरावट से भी कहीं आगे जा कर ‘रिसेशन’ यानी मंदी में बदल गया है? गिरावट का मतलब होता है पिछली वृद्धि-दर के मुकाबले तुलानत्मक रूप से कम रफ्तार से अर्थव्यवस्था का बढ़ना। मंदी का मतलब है वृद्धि-दर का नकारात्मक हो जाना, यानी शून्य से नीचे चले जाना। सरकार ने हाल ही में दावा किया है कि इस संकट को मंदी कहना ठीक नहीं है। लेकिन विख्यात अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने विस्तार से दलील दी है कि जिसे गिरावट कहा जा रहा है, वह दरअसल वृद्धि-दर का खत्म हो जाना है। अपनी बात साबित करने के लिए उन्होंने संगठित क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र में पूरी आर्थिक गतिविधि को बांटते हुए दिखाया है कि संगठित क्षेत्र में आई असाधारण गिरावट को जैसे ही ‘फेक्टर-इन’ किया जाता है, वैसे ही दिखने लगता है कि चार या साढ़े चार फीसदी की कथित वृद्धि-दर का वजूद है ही नहीं। यह आंकड़ा केवल संगठित क्षेत्र का है, जो इतना इसलिए दिख रहा है कि कुल घरेलू उत्पाद नापने का आधार-वर्ष बदल दिया गया था। अगर इसे पहले वाले आधार-वर्ष से नापा जाए तो वृद्धि-दर दो-ढाई फीसदी ही रह जाती है, और असंगठित क्षेत्र (जो आकार में संगठित क्षेत्र से बड़ा है) में कोई वृद्धि न होने के का कारण यह गणात्मक होने के लिए मजबूर हो जाती है।सरकार की प्रतिक्रिया यह है कि उसने संगठित क्षेत्र के लिए रियायतों की घोषणा की है, जिनका कुछ लाभ अवश्य होगा, लेकिन तुरंत नहीं। समझा जाता है कि यह फायदा अल्पावधि में न हो कर मध्यावधि में दिखाई पड़ेगा। मुश्किल यह है कि सरकार के पास असंगठित क्षेत्र को जीवन देने के लिए न कोई योजना है, और न ही कोई इरादा दिखाई पड़ रहा है। नोटबंदी और जीएसटी के कार्यान्वयन ने असंगठित क्षेत्र को गहरी हानि पहुंचाई है, और उसकी भरपाई करना सरकार के नीतिगत और रणनीतिक उद्देश्यों में नहीं दिखाई पड़ रहा है। प्रश्न यह है कि सरकार को कोई यह राय क्यों नहीं दे रहा है? ज़ाहिर है कि कोई उद्योगपति सरकार को इस तरह की सलाह देने से रहा। यह काम तो अर्थशास्त्रियों और अन्य विशेषज्ञों का है। सरकार के पास एनआईटीआई आयोग है, उसकी अपनी आर्थिक सलाहकार परिषद है। इन संस्थाओं में बैठे लोग क्या कर रहे हैं? ऐसा लगता है कि वे सरकार को ऐसी कोई राय देने से परहेज़ करते हैं जो सरकार सुनना नहीं चाहती। वे केवल खुशनुमा बातें करते हैं और प्रधानमंत्री को कोई अप्रिय संदेश नहीं देना चाहते। सुना यह भी गया है कि प्रधानमंत्री वैसे तो नीतिगत मसलों पर गहराई से विचार करते हैं, लेकिन आर्थिक प्रश्नों पर देर तक दिमाग खपाने का माद्दा उनके पास नहीं है। वे जल्दी ही बोर हो जाते हैं। पहले वे इस प्रकार के चिंतन की ज़िम्मेदारी अरुण जेटली पर डाल कर छुट्टी पा लेते थे, लेकिन अब जेटली नहीं हैं और निर्मला सीतारमन अभी तक उस किस्म की योग्यता प्रदर्शित नहीं कर पाई हैं। डा. मनमोहन सिंह और राहुल बजाज की बातों में एक चेतावनी निहित है जिसका ज़िक्र ऊपर किया जा चुका है। विधानसभा के चुनावों ने सरकार को हल्का-सा चिंतित किया है, लेकिन बेचैन नहीं। मोदी जी के चेहरे पर अभी किसी तरह की शिकन नहीं आई है। वे विभिन्न मंचों से पूरे विश्वास के साथ अपनी विशिष्ट शैली में देश का नेतृत्व करने की कवायद में लगे हुए हैं। लेकिन, अगर वे चाहें तो देख सकते हैं कि आर्थिक संकट का असर वोटरों पर पड़ना शुरू हो गया है।  अभी इस असर की अभिव्यक्तियां खामोशी की तऱफ हैं। अगर असंगठित क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों ने दोबारा सिर नहीं उठाया, तो साल-छह महीने के भीतर ही यह असर तरह-तरह की आवाज़ों में बोलने लगेगा। दबे हुए संकट को धमाके के साथ सबसे सामने आने के लिए एक ‘ट्रिगर पाइंट’ की ज़रूरत होती है। यह विस़्फोट बिंदु कुछ भी हो सकता है। प्याज़ की महंगाई, बेरोज़गारी, या कुछ और। अभी कुछ व़क्त है, सरकार चाहे तो संभल सकती है।