भक्ति द्वार माता पूर्णागिरि


जगत जननी सुखदायिनी आदिशक्ति माता शेरांवाली की महिमा को कौन नहीं जानता? शेरांवाली का एक नाम पूर्णागिरि भी है। कुमायूं-हिमालय की जाग्रत देवी हैं पूर्णागिरि। अशोकाष्टमी को लाखों भक्तों की भीड़ जुटती है। जनश्रुति है कि देवी आज भी सिंह पीठ पर सवार होकर हर रात यहां विचरण करती हैं। कहा जाता है कि नाभि पूर्णागिरि में गिरी थी। कुछ लोग याजपुर में भी बताते हैं। हां, पूर्णागिरि महापीठ अवश्य है। पथ दुर्गम है, जोखिम भरा भी है। लखनऊ-काठगोदाम रेलमार्ग पर पीलीभीत से शाखा लाइन टनकपुर गयी है। लखनऊ से नैनीताल एक्सप्रेस में सीधी थ्री टायर बोगी भी आती है जो पीलीभीत से पैसेन्जर टे्रन में जुड़कर टनकपुर पहुंचती है। इसके अलावा भारत के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालुजन प्राइवेट बसें भाड़े पर लाकर मां शेरांवाली के दर्शन के लिए आते हैं। उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों से टनकपुर सरकारी बसें भी आती हैं। शारदा नदी से घिरा टनकपुर भारत एवं नेपाल का सीमा शहर है। उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहर इलाहाबाद तथा राजधानी लखनऊ स्थित कैसर बाग डिपो से उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बसें टनकपुर के लिए आती हैं। यात्रियों को इनके समय की जानकारी उत्तर प्रदेश परिवहन निगम के कार्यालय से कर लेनी चाहिए। लखनऊ से टनकपुर की दूरी 316 किमी तथा टनकपुर से पूर्णागिरि 35.2 कि. मी. दूर है। चैत की अमावस्या से पूर्णिमा अर्थात एक पखवाड़े तक और फिर दुर्गापूजा के नवरात्रि के अवसर पर दूर-दराज के लोग यहां आते हैं। मेला लगता है और अस्थायी सामयिक यात्री निवास तैयार होता है। मेले के दौरान घने जंगलों में ऊंची-नीची पहाड़ी डगर पर बसें एवं जीपें भी टनकपुर से 19 कि.मी. दूर पहाड़ की तराई में टूलीगढ़ तक चलती हैं। ध्यान देने योग्य है कि गत वर्ष से टनकपुर से जीपें टूलीगढ़ से आगे टूनसास तक चलने लगी हैं जहां से मन्दिर की दूरी मात्र डेढ़ किमी पैदल बची है। सरकार ने पहाड़ों को काटकर यात्रियों की सुविधा के लिए टूनसास तक सड़क मार्ग का निर्माण कराया है। मन्दिर के रास्ते में पड़ने वाले टूलीगढ़ और टूनसास में भी तामझाम भरा मेला लगता है। होटलों में ठहरने की भी व्यवस्था रहती है। पूर्णागिरि के मेले के दौरान बहुत से तीर्थयात्री टूलीगढ़ तथा टनकपुर से ही अपनी पद यात्रा शुरू कर देते हैं, जो माता में आस्था का प्रतीक है। संकीर्ण सर्पिल ऊबड़-खाबड़ डगर गहन वन से भरी है। एक ओर आकाश को अब छुएं, तब छुएं जितने उत्तुंग पर्वत शिखर और दूसरी ओर पाताल लोक की भयावहता समेटे गहरी खाइयां और फिर शारदा नदी का यौवन भरा प्रवाह। पग-पग पर मानो खतरों से गुजर रहे हों। इस मार्ग की चढ़ाई प्राणान्तक है, फिर भी नैसर्गिक छटा एवं देवी मां की महिमा एवं दया के बल पर तीर्थयात्री यहां पहुंच ही जाते हैं। सम्पूर्ण रास्ते के दोनों तरफ पूजा सामग्री की दुकानें सजी रहती हैं तथा रास्ते भर तीर्थयात्रियों की गवाहियों की प्लेटें एवं बैनर उनके नाम एवं पते के साथ लिखे मिलते हैं कि उनकी मनोकामना पूरी हुई। पैदल अथवा भाड़े के वाहनों द्वारा टूनसास पहुंचने के बाद डेढ़ किमी और आगे पूर्णागिरि है। रेलिंग से घिरी सीढ़ियों के ऊपर चार कोनों पर चार खम्भों पर स्थापित है छोटा-सा मन्दिर। सात फीट ऊंचे मन्दिर में अष्टभुजी मां भगवती की प्रतिमा है। देवी हर मांगी मनोकामना पूरी करती हैं। कभी किसी की मनोकामना अपूर्ण नहीं रही।  स्वप्न में मिले आदेश के अनुसार कुमायूं के महाराज ज्ञानचन्द ने विक्र मी संवत 1632 में श्वेत संगमरमर की देवी प्रतिमा व मन्दिर का निर्माण कराया। यहां पत्ताविहीन ठूंठ एक वृक्ष है जिसका नाम सच्चा दरबार है। मेले को छोड़ यहां पग-पग पर जोखिम है। जीव-जन्तु व डाकुओं, तस्करों का भय हमेशा बना रहता है। टनकपुर से पूर्णागिरि तक जाने के लिए स्वयं अपनी व्यवस्था करनी पड़ती है। टनकपुर से दूरी 35.2 किमी है। भाड़े की जीपों में भाड़ा पहले तय कर लेना चाहिए। विशेष बात यह है कि मेले के दौरान कुमायूं विकास प्राधिकरण सम्पूर्ण रास्ते भर बिजली, पानी, स्नान एवं शौच की स्वच्छ एवं उत्तम व्यवस्था करता है। साथ ही मन्दिर की नयनाभिराम छवि, प्राकृतिक सुन्दरता एवं मां की कृपा से दिल में एक अतीव प्रसन्नता होती है जो अरबों-खरबों रुपये खर्च करके भी प्राप्त नहीं हो सकती। 

 —आर.के. कश्यप