सफल क्यों नहीं हो रहा स्वच्छता अभियान ?


लीजिए एक बार फिर से गुजर गई स्वच्छ भारत अभियान की वर्षगांठ। ज़ोर-शोर से गांधी जी को याद किया गया। सफाई रखने पर भाषण करवाए गए। विद्यालयों और कालेजों में और फिर फोटो अखबारों में छपी, समाचार छपे, सोशल मीडिया इस सारी दौड़ में शायद सबसे आगे और फिर मौसमी त्यौहार समझ यह सब डिब्बा बंद। अब अगले वर्ष फिर से बंद डिब्बे से स्वच्छता का भूत निकलेगा। हल्ला-गुल्ला करेगा और फिर यही सब गतिविधियों के बाद लम्बी कुम्भकर्णी नींद सो जायेगा। क्यों यही सब होता है ना। विश्लेषण छपते हैं या किए जाते हैं। भारत का कौन-सा शहर सबसे गंदा, सबसे साफ। कौन-सा कस्बा, गांव या कालोनी कौन से नम्बर पर रहा। लेकिन कुछ दिनों बाद अगर बारीकी से मुआयना किया जाए तो पता लगता है यह सब दिखावा ही रहता है। गंदगी के बड़े-बड़े ढेर तब तक बढ़ते जाते हैं, जब कूड़ा उड़-उड़ कर आसपास के क्षेत्रों में न फैल जाए। न सिर्फ कूड़ा परन्तु बेहद गन्दी बदबू आपका इस कद्र पीछा करती है कि कार के बंद शीशों के बावजूद कम से कम एक किलो मीटर तक आप खुलकर सांस नहीं ले पाते। अक्सर यह देखा गया है कि लोग अपने घरों का कूड़ा निकाल कुछ तो सफाई कर्मचारी को उठवा देते हैं और बाकी बाहर गली के किसी कोने या मोड़ या फिर पार्क की चारदीवारी के पास फेंक कर उस जगह को ‘ शोभायमान’ करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस अभियान का मकसद बहुत महत्वपूर्ण और सभी के स्वास्थ्य को लाभ देने वाला है। वातावरण केन्द्रित यह अभियान आखिर सिरे क्यों नहीं चढ़ रहा? सवाल यह उठता है कि हम सब कहते बहुत कुछ हैं, लेकिन करनी और कथनी में अंतर रखते हैं। जब तक हमारे मन से स्वच्छता की आवाज़ नहीं उठती तब तक भारत का स्वच्छता अभियान उस मरीज़ की भांति होगा जो वेंटीलेटर पर सांस लेता है और प्राकृतिक तौर पर मृत होता है। अपने घर का कूड़ा निकाल नुक्कड़ पर या किसी खाली प्लाट में डालने से हमारी संकीर्ण मानसिकता ही झलकती है। अब बात करें सरकारों की। हम भारतीय शायद डंडे के जोर पर ही काम करने के कायल हैं। विदेशों में बसे भारतीय सारे नियमों को वहां मानते हैं, लेकिन भारत में रहने वाले अधिकतर लोग नियमों को ताक पर रखना अपनी शान समझते हैं। कूड़ेदान के बावजूद कूड़ा बाहर बिखरा मिलना, जहां चाहे गंदगी बिखेर देना, चिप्स, कोल्ड ड्रिंक, पानी की खाली बोतलें और पोलीथीन कहीं भी खाली हुए चलते वाहन से बाहर फैंकने में लोग एक सैकेंड नहीं सोचते। ‘अरे फैंक दी कहीं भी, यह भारत देश है कोई कुछ नहीं कहता’। कई बार इस तरह के वाक्य विदेशों में रहने वाले भारतीयों के मुख से सुने जाते हैं। क्या हमारी सरकार कोई ऐसे सख्त नियम नहीं बनाती जिससे भारत भी विदेशों जैसा साफ रह सके। सख्त जुर्माना या सज़ा का प्रावधान ही ऐसी विकृत सोच को राह पर ला सकता है। कुछ एन.जी.ओ., कुछ सरकारी विभाग मिलकर बेरोज़गार युवाओं को इस निगरानी में लगा कर एक तो उन्हें काम दे सकते हैं और दूसरे देश की धरती का कायाकल्प कर सकते हैं। वरना हमारी बसुधा बिना असली सफाई के कभी हरी-भरी नहीं दिख सकती। लोग स्पेस में और ऐवरेस्ट में सफाई अभियान चला रहे हैं और हम यहां अपनी ही धरा को गंदगी का आंचल ओढ़ा रहे हैं। ज़रूरत है एक खुली सोच की ताकि नीले आसमान के नीचे हरी धरती खुल कर सांस ले और हमारे जीवन हमेशा नई जान फूंक सके। यदि हम स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें अपने घर से इसकी शुरूआत करनी चाहिए। और फिर अपने आस-पड़ोस से। सिर्फ घर को स्वच्छ रखने से ही हम अपने स्वच्छता के मिशन में सफल नहीं हो सकते। इसलिए हम सभी का यह दायित्व बनता है कि हम अपने आसपास को स्वच्छ रखें और कूड़े-कर्कट के ढेर जो अक्सर सड़कों पर बिखरे नज़र आते हैं, इनके बारे में भी हमें गम्भीरता से सोचना होगा।