क्यों निष्क्रिय हो रहे हैं दुनिया भर के किशोर ?    


फिजिकल एक्टिविटी को प्रोत्साहित करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) ने एक नई ग्लोबल योजना ‘मोर एक्टिव पीपल फॉर ए हेल्दियर वर्ल्ड’ (स्वस्थ संसार के लिए अधिक सक्रिय लोग) लांच की है। इसका उद्देश्य यह है कि 2030 तक विभिन्न आयु वर्गों में जो फिलहाल अपर्याप्त फिजिकल एक्टिविटी की समस्या है, उसमें से 15 प्रतिशत की कमी आ जाए। इस योजना को लांच करने की इसलिए आवश्यकता पड़ी क्योंकि डब्ल्यू.एच.ओ. के नेतृत्व में किए गए (और ‘द लांसेट’ में प्रकाशित) एक ताजा अध्ययन से यह चिंताजनक तथ्य प्रकाश में आया है कि 2016 में ग्लोबली 81 प्रतिशत किशोर अपर्याप्त फिजिकली सक्रिय थे। हालांकि लड़कियों की तुलना में लड़के अधिक सक्रिय हैं, लेकिन दोनों की ही असक्रियता का प्रतिशत काफी अधिक व चिंताजनक है। 77.6 प्रतिशत लड़के असक्रिय हैं और इस संदर्भ में लड़कियों का प्रतिशत 84.7 है। यह सर्वे 146 देशों में 11 से 17 वर्ष के 1.6 मिलियन किशोर छात्रों पर किया गया। जहां तक भारत की बात है तो हर चार में से तीन किशोर पर्याप्त रूप से सक्रिय नहीं हैं। कहने का मतलब यह कि वे रोजाना कम से कम एक घंटे शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं हैं। जबकि स्वस्थ रहने की यह न्यूनतम आवश्यकता है। तथ्यों के आईने में देखें तो भारत में 73.9 प्रतिशत किशोर अपर्याप्त रूप से फिजिकली सक्रिय हैं। डब्ल्यू.एच.ओ. के अनुसार शारीरिक रूप से पर्याप्त सक्रिय न होने के कारण मोटापा, हृदय रोग, डायबिटीज, डिप्रैशन सहित अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की आशंका बढ़ जाती है। दुनिया में शारीरिक रूप से सबसे कम सक्रिय किशोर बंगलादेश (66.1 प्रतिशत) के हैं। इसके बाद आयरलैंड (71.8 प्रतिशत) और अमरीका (72 प्रतिशत) के किशोर आते हैं। जहां तक सबसे सक्रिय किशोरों की बात है तो ये दक्षिण कोरिया (94.2 प्रतिशत), फिलिपीन्स (93.4 प्रतिशत) और कंबोडिया (91.6 प्रतिशत) के हैं। इस अध्ययन में किसी देश की आर्थिक स्थिति के हिसाब से फिजिकल एक्टिविटी का कोई स्पष्ट पैटर्न सामने नहीं आया। कम आय वाले देशों में 84.9 प्रतिशत अपर्याप्त फिजिकल एक्टिविटी का शिकार हैं, जबकि लोअर-मिडिल आय देशों में यह प्रतिशत 79.3 है। अपर-मिडिल आय देशों में 83.9 प्रतिशत और हाई-इनकम देशों में 79.4 प्रतिशत। हालांकि इस अध्ययन से कुछ आंकड़े सामने आ जाते हैं व कुछ तथ्यों की पुष्टि हो जाती है। लेकिन इसके बिना भी यह सर्वविदित है कि इंटरनैट, मोबाइल, टी.वी. और अन्य उपकरणों की वजह से फिजिकल एक्टिविटी में दिलचस्पी कम होती जा रही है। हर कोई बस अपने स्मार्टफोन से चिपका रहना चाहता है। बड़े शहरों में मैदानों, पार्कों आदि की कमी और निरंतर बढ़ते प्रदूषण के कारण तो यह समस्या अधिक चिंताजनक हो गई है। बच्चों के विरुद्ध बढ़ते अपराधों ने भी इसमें वृद्धि की है। हालांकि सर्वे से मालूम होता है कि भारत में 2010, जब 11-17 वर्ष के 76.6 प्रतिशत असक्रिय थे, के बाद से सक्रियता स्तर में इजाफा हुआ है। लेकिन इन किशोरों को अब भी अधिक एक्सरसाइज व आउटडोर प्ले की आवश्यकता है। दरअसल, बच्चों को घर व पड़ोस में तो खेलने-कूदने को मिलता ही नहीं, अब स्कूलों में भी यही हाल होने लगा है। अधिकतर स्कूलों में तो प्ले ग्राउंड ही नहीं हैं। भारत में किए गए अनेक अध्ययनों से मालूम होता है कि प्राइवेट स्कूलों की तुलना में सरकारी स्कूलों में मोटापे का स्तर कम है। इस समय आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मैडिकल साइंसेज (एम्स) स्लीप एपनिया, जो कि मोटापे से संबंधित स्लीप डिसऑर्डर हैं यानी सही से नींद न आना। इस अध्ययन के तहत एम्स ने दिल्ली के छात्रों का मोटापे, डायबिटीज, हृदय रोग के खतरे जैसे कोलेस्ट्रॉल व ब्लड प्रैशर के लिए स्क्रीन किया और पाया कि मोटापा दर प्राइवेट स्कूलों में कहीं अधिक है। जहां बच्चे ज्यादा सम्पन्न परिवारों से आते हैं। डाटा के विश्लेष्ण से मालूम होता है कि ये बच्चे स्क्रीन (स्मार्टफोन, टेबलेट, गेमिंग कंसोल, लैपटॉप व टी.वी.) पर अधिक समय गुजारते हैं। साथ ही फिजिकल एक्टिविटी में कम शामिल होते हैं। ये जंक फूड का भी अधिक सेवन करते हैं। दूसरी ओर सरकारी स्कूल के बच्चों के पास चूंकि पैसे व साधनों का अभाव होता है इसलिए वह इन चीजों को कम एक्सैस कर पाते हैं। इससे उन्हें खेलने-कूदने का अवसर व समय मिलता है। फलस्वरूप उनमें मोटापे की समस्या तुलनात्मक दृष्टि से कम है। इसलिए यह आवश्यक है कि बच्चों को घर, पड़ोस, स्कूल जाते समय ऐसा वातावरण उपलब्ध कराया जाए जिसमें वह खेल सकें, मनोरंजन कर सकें। इसके लिए ग्रीन पार्क्स व शहरी बागों को 0.5 कि.मी. के दायरे में लाने की आवश्यकता होगी, स्कूलों में पर्याप्त प्लेग्राऊंड चाहिए होंगे और सड़क के बराबर चौड़े पेवमैंट हों जो खेल व वाक को प्रोत्साहित करें। इससे एक अन्य लाभ यह होगा कि प्रदूषण स्तर में भी कमी आएगी। सभी स्कूलों में हर छात्र के लिए स्पोर्ट्स, खेल व नृत्य के लिए समर्पित समय होना चाहिए।  अगर स्कूल स्तर से ही फिजिकल एक्टिविटी में इजाफा कर दिया जाए तो हृदय रोगों व डायबिटीज को काफी हद तक कम किया जा सकेगा। यह काम आक्रामकता से करना होगा और इसे शुरू करने का समय है अब।