आकाश-कुसुम हुआ प्याज़


देश में खाद्य पदार्थों और खासकर प्याज़ के मूल्यों में हो रही वृद्धि ने विपक्षी दलों के साथ-साथ सत्ता पक्ष को भी चिंता में डाला है हालांकि सरकार अभी भी लीपा-पोती की कोशिशों में लगी है। ऐसा इसलिए भी कि सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों एवं अन्य कई राजनीतिज्ञों के बयान ऐसे हैं जैसे वे इस समस्या को अत्यन्त सतही तौर पर ले रहे हैं। उदाहरणतया केन्द्रीय वित्त मंत्री सीतारमण ने पिछले दिनों एक बयान में कहा कि उनका परिवार शाकाहारी है, और उनके घर में प्याज़ बहुत कम आता है। ऐसा ही एक बयान केन्द्रीय परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्यमंत्री अश्विनी चौबे ने एक कदम आगे बढ़ा कर दिया कि चूंकि वह प्याज़ नहीं खाते, अत: उन्हें पता ही नहीं कि प्याज़ की कीमतें कहां से बढ़ कर कहां तक पहुंची हैं। खाद्यान्न एवं अन्य वस्तुओं संबंधी उपभोक्ता मामलों के मंत्री राम विलास पासवान जब स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि प्याज़ के दामों में अभी डेढ़-दो मास तक कमी नहीं आ सकती, तो इसे जन-साधारण को व्यापारियों के रहम-ओ-करम पर छोड़े जाने के तुल्य ही कहा जा सकता है। पासवान ने तो साढ़े तीन मास पूर्व भी दावा किया था कि प्याज़ के दामों में अगले कुछ दिनों में कमी आ जायेगी।  बात केवल प्याज़ की ही नहीं है, अपितु फल, सब्ज़ी, दालें, दूध आदि खाद्यान्न पदार्थों और घरेलू उपभोग की अन्य वस्तुओं के दामों में भी सतत् वृद्धि हुई है। दूध के दामों में वृद्धि तो स्वयं सरकार ने भी स्वीकार की है, जबकि सरकारी केन्द्रों से दूध के दाम 10 रुपए लीटर बढ़ा दिये गये हैं। स्वाभाविक तौर पर निजी धरातल पर दूध-विक्रेता भी यही पथ अपनायेंगे। इस कारण समाज में प्रत्येक वस्तु के मूल्यों में वृद्धि का एक ऐसा सिलसिला शुरू हुआ है कि जिसने आम आदमी के सम्पूर्ण घरेलू बजट को पूरी तरह से गड़बड़ा कर रख दिया है। तिस पर सितम की बात यह है कि केन्द्र सरकार की ओर से इस स्थिति से निपटने अथवा इस पर नियंत्रण पाने के लिए गम्भीरता से किया जाने वाला कोई भी उपाय आस-पास होते दिखाई नहीं देता। मूल्य-वृद्धि और खास तौर पर प्याज़ एवं टमाटर के दामों में हुई अथाह वृद्धि के लिए उत्पादन में कमी के अतिरिक्त अन्य अनेक कारण उत्तरदायी हो सकते हैं। प्याज़ की कीमतें पहले भी बढ़ती रही हैं, और पिछली दो बार की कांग्रेस सरकारों के समय भी प्याज़ जन-साधारण और सरकार दोनों को रुलाता रहा है। तब भी प्राय: संसद के भीतर और बाहर विपक्ष खास तौर पर भाजपा वाले आसमान सिर पर उठाते रहे, परन्तु उस दौर में प्याज़ कभी भी सौ रुपए किलो से अधिक नहीं हुआ था। इस बार तो जैसे प्याज़ के दाम सभी सीमाएं लांघते प्रतीत हो रहे हैं। कई राज्यों में प्याज़ डेढ़ सौ रुपए से ऊपर हो गया है तथा प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ज़रा-सा भी चिन्तित हुए प्रतीत नहीं होते। सरकार एवं प्रशासन के अन्य अधिकारियों के रवैये से ऐसा प्रतीत होता है कि रोम जलता है तो जले, नीरो को बांसुरी बजाने से ही फुर्सत नहीं है। प्याज़ के दामों में वृद्धि का एक बड़ा कारण इसकी जमाखोरी को माना जा रहा है। आज भी यही मानसिकता सामने आ रही है। सरकार बार-बार भंडारकों के विरुद्ध चेतावनियां तो जारी करती है, परन्तु अभी तक किसी के विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष कार्रवाई की गई हो, ऐसा कोई प्रमाण नहीं है। आश्चर्य की बात है कि  प्याज़ के दाम विगत चार-पांच माह से लगातार बढ़ते जा रहे हैं। सरकार ने सितम्बर मास में प्याज़ के निर्यात पर रोक लगाने की घोषणा भी की थी। सरकार और उसके मंत्री बार-बार आयात की बात भी कर रहे हैं। कमाल है, यह तो आग लगने पर कुआं खोदने जैसी बात हो गई। उत्पादन में कमी थी, तो पहले आयात क्यों नहीं किया, अथवा कमी की आशंका के बावजूद  निर्यात क्यों होने दिया? यह तो सरासर प्रशासनिक कोताही है। यह भी कि उत्पादक किसानों को प्रोत्साहन देकर उत्पादन क्यों नहीं बढ़ाया गया, जबकि प्रत्येक राजनीतिज्ञ को पता है कि देश के सभी राज्यों में प्याज़ की बड़ी खपत होती है। यह भी एक समस्या है कि सरकार का अपने प्रशासनिक तंत्र पर कभी भी पूरा नियंत्रण प्रतीत नहीं हुआ। अब यदि अफगानिस्तान से आयातित प्याज़ के ट्रक पंजाब के लिए पहुंचे भी हैं, तो कुलियों की हड़ताल का संकट सामने आ गया। पंजाब में भी प्याज़ के बढ़ते दामों ने इसे आकाश-कुसुम जैसा बना दिया है। इस पूरे मामले में एक बात यह भी जानने योग्य है कि व्यापारिक धरातल पर तो प्याज़ के दाम निरन्तर बढ़ते जा रहे हैं, परन्तु फसल के दिनों में प्याज़ उत्पादक किसानों से आढ़ती वर्ग 8-10 रुपए किलो के हिसाब से ही खरीद करता आया है। हम समझते हैं कि महंगाई एवं मूल्य-वृद्धि के धरातल पर स्थिति नि:संदेह रूप से संतोषजनक तो कदापि नहीं है। प्याज़ और टमाटर की बात यदि जाने भी दें, तो भी, अन्य अनेक खाद्य पदार्थों की आपूर्ति और मूल्य-वृद्धि चिंताजनक है। दालों की कीमतें व्यापारी चुपचाप बढ़ा देते हैं। घरेलू राशन-पानी का बजट असंतुलित हुआ है। छोटे किसान को न तो उसकी फसल का उचित दाम मिलता है, न उसके हिस्से में सरकारी राहत अथवा अनुदान राशि ही आती है। फिर बीच में कहां पर यह गड़बड़ झाला हो जाता है, यह पता चलाने में हमेशा सरकार असफल रहती है। राजनीतिक दल इस स्थिति को अपने-अपने ढंग से अपने-अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश में लगे रहते हैं। आम आदमी की चिन्ता किसी को भी नहीं है। होती तो प्याज़ के दाम आसमान को नहीं छूते। आखिर कहीं-न-कहीं तो इस टूटी कमन्द को थामना ही पड़ेगा। प्याज़ की महंगाई ने इससे पहले भी कई बार सरकारों की बलि ली है। यह लॉबी बेहद शक्तिशाली है, यह इस बात से ही सिद्ध हो जाता है कि इसके ओर-छोर का पता ही नहीं चलता। वस्तुओं की मौजूदा महंगाई इस सरकार के किस हिस्से पर भारी पड़ेगी, यह देखने वाली बात होगी।