बेलगाम होती महंगाई


देश में बढ़ती मुद्रा-स्फीति और परचून धरातल पर महंगाई में हुई वृद्धि ने देश के जन-साधारण को एक बार फिर चौंकाया है। रिज़र्व बैंक की एक योजनागत घोषणा के अनुसार परचून में मुद्रा स्फीति की दर बढ़ कर 4.62 प्रतिशत हो गई है जबकि दो मास पूर्व यह दर 3.99 प्रतिशत थी। रिज़र्व बैंक ने यह पुष्टि सितम्बर मास के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर की है। इसके साथ ही खाद्यान्न पदार्थों के धरातल पर मुद्रा स्फीति की दर 7.89 प्रतिशत दर्ज की गई है जबकि अक्तूबर मास में यह दर 5.31 प्रतिशत थी। महंगाई में वृद्धि की इस दर ने जहां जन-साधारण के घरेलू बजट को प्रभावित किया है, वहीं आम आदमी की घरेलू रसोई पर कमी का संकट भी गहरा हुआ है। जहां तक मूल्य-वृद्धि का संकट है, तो यह वृद्धि प्रत्येक वस्तु में प्रत्येक धरातल पर हुई है। तो भी आटा, दाल, चीनी, घी, फल और सब्ज़ियों के दामों ने आम आदमी की क्रय शक्ति को घटाया है। इससे मार्किट में मुद्रा का संकट पैदा हुआ है। इस पूरे मामले में सितम की बात यह भी है कि न तो इस स्थिति को लेकर सत्ता पक्ष के कानों पर जूं रेंगी है, और न ही विपक्ष का जन-साधारण की चिंता करने वाला कोई चेहरा दिखा है। लिहाज़ा आम आदमी जिस प्रकार की स्थितियां करवट लेती हैं, उसी के अनुरूप स्वयं को ढाल लेने पर विवश हुआ दिखता है।वित्त विशेषज्ञों के अनुसार सरकार के लाख प्रयत्नों के बावजूद वित्तीय स्थिति की निरन्तर बिगड़ती स्थिति पटरी पर नहीं लौट पा रही है जिससे आम आदमी और खास तौर पर देहात क्षेत्र की आर्थिकता बहुत प्रभावित हुई है। इस क्षेत्र की एक रिपोर्ट के अनुसार महंगाई और मुद्रा-स्फीति की स्थिति में बिगाड़ घरेलू वस्तुओं खास तौर पर दालों, फलों और सब्ज़ियों के दाम बढ़ने से आया है। दालों और फल-सब्ज़ियों की वृद्धि ने बाज़ार के सम्पूर्ण संतुलन को बिगाड़ कर रख दिया है। बाज़ार से सम्बद्ध अर्थ-शास्त्रियों के अनुसार वर्तमान में देश में मौजूद मंदी और मुद्रा-स्फीति के लिए दालों, सब्ज़ियों और खाद्यान्न पदार्थों की मूल्य-वृद्धि ही ज़िम्मेदार है। जैसे-जैसे देश में मूल्य-वृद्धि और महंगाई की रफ्तार बढ़ी है, उसी अनुपात से मुद्रा-स्फीति ने भी करवट ली है। इससे ग्राम्य धरातल पर आय अथवा उजरत की दरों में वृद्धि नहीं हो पा रही है। वित्तीय सूत्रों के अनुसार घरेलू धरातल की इस मूल्य अस्थिरता ने आम आदमी की क्रय करने की क्षमता को बेहद प्रभावित किया है। राष्ट्रीय गणना कार्यालय की लीक हो गई एक रिपोर्ट में भी दावा किया गया है कि विगत चार दशकों में पहली बार ग्रामीण धरातल पर आ गई सुस्ती के कारण आम आदमी की क्रय शक्ति में कमी आई है। सरकार ने भी मानो परोक्ष रूप से इस दावे को स्वीकार कर लिया है जबकि उसने इस रिपोर्ट के आंकड़ों को सार्वजनिक करने से ही इन्कार कर दिया है। अर्थ-शास्त्रियों के अनुसार देश की मौजूदा स्थिति ने रोज़गार के अवसरों को बहुत कम किया है तथा व्यवसायिक एवं औद्योगिक जगत में नौकरियों पर भी विपरीत साया बढ़ा है। व्यवसायिकता में भी ठहराव आया है जिससे देश के सकल घरेलू उत्पाद में कमी होते नज़र आई है।निष्कर्ष-स्वरूप यह कि नरेन्द्र मोदी की सरकार की इस दूसरी पारी में वित्तीय धरातल पर सब कुछ ठीक तो नहीं है। अर्थ-शास्त्रियों का यह आकलन भी चौंकाता है कि मंदी और मुद्रा-स्फीति में इज़ाफे वाली इस स्थिति के वर्षांत तक बने रहने की प्रबल सम्भावना है। यह भी एक तथ्य ध्यान आकर्षित करता है कि देश का जन-साधारण इस स्थिति से  बेहद उपराम है, परन्तु इससे बचने का कोई मार्ग किसी को सूझ नहीं रहा। सरकार के तमाम यत्नों और उसकी घोषणाओं के बावजूद मूल्य-वृद्धि और महंगाई पर अंकुश नहीं लग रहा। व्यवसायिक समाज के अनुसार खाद्यान्न पदार्थों खास तौर पर फल-सब्ज़ी-दालों की कीमतों में वृद्धि के लिए व्यापारियों की भंडारण वृत्ति भी उत्तरदायी है, परन्तु सरकार के मंत्रियों की अज्ञानता और उनकी ब्यानबाज़ी वाली मानसिकता के कारण स्थितियां सुधरने की बजाय और बिगड़ने लगती हैं। यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि एक तरफ महंगाई ने लोगों का जीना दूभर किया है, लोग महंगे मूल्य पर खाद्य वस्तुएं खरीदने के लिए मजबूर हैं, परन्तु दूसरी तरफ इन वस्तुओं के उत्पादक किसान मंडी में बहुत सस्ती कीमत पर अपनी जिन्स बेचने के लिए मजबूर हैं। मंडीकरण की प्रक्रिया में आये इस असंतुलन को दूर किए बिना महंगाई पर काबू पाना मुश्किल है। स्थितियों की गम्भीरता पर अंकुश न होने के कारण व्यवसायिक क्षेत्र भी निरंकुश होता जा रहा है। मंत्री एवं प्रशासनिक अधिकारी केवल ब्यानबाज़ी तक अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं तथा समस्या की जड़ तक कोई भी नहीं पहुंच पाता। इस कारण यह समस्या और भी गम्भीर होती जाती है। उदाहरण के तौर पर प्याज़ और टमाटर की कमी और मूल्य-वृद्धि को लिया जा सकता है। मंडी और परचून बाज़ार में प्याज़ और आलू बढ़िया सेब से भी महंगे भाव बिक रहे हैं। जब भी कभी कोई मंत्री अथवा अधिकारी इस संबंध में बात करते हैं तो किसी न किसी बहाने की आड़ लेकर समस्या को आगे धकेल देते हैं। प्याज़ और टमाटर की कमी और मूल्य वृद्धि का संकट पहले भी कई बार उत्पन्न होता रहा है, परन्तु देर-सवेर इस पर काबू पा लिया जाता है। इस बार यह हो रहा है कि मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की। सम्बद्ध केन्द्रीय मंत्रियों के ब्यानों से कभी भी ऐसा आभास नहीं हुआ, कि सरकार इस मामले को लेकर गम्भीर है।हम समझते हैं कि समस्या का कारण कुछ भी हो, जन-साधारण को उससे निजात दिलाने का कार्य सरकार अथवा उसके प्रशासन का होता है। मौजूदा धरातल पर आम आदमी को मंदी अथवा मुद्रा-स्फीति से कुछ लेना-देना नहीं होता। उसे तो महंगाई अथवा मूल्य वृद्धि से राहत चाहिए। सरकार इस कार्य को कैसे और कितनी जल्दी करती है, इसी पर उसकी सफलता एवं कार्य-कुशलता निर्भर करती है। महंगाई और मूल्य वृद्धि पर काबू पाने का दायित्व मौजूदा सरकार का है। सरकार जितना शीघ्र अपने दायित्वों का पालन करेगी, उतना ही उसके अपने स्वास्थ्य और उसकी लोकप्रियता के लिए हितकर होगा।