पी.वी. सिंधु ने रचा इतिहास


रविवार (25 अगस्त-2019) भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन के नजरिये से बेहद शानदार रहा। नार्थ साउंड में भारत ने टेस्ट चैंपियनशिप के अपने पहले मैच में वेस्टइंडीज को 318 से पराजित करके 60 अंक अर्जित किये। लेकिन इससे भी बढ़कर उपलब्धि यह रही कि ब्रासेल (स्विट्जरलैंड) में भारत की नंबर एक बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु ने इतिहास रच डाला। सिंधु बैडमिंटन की विश्व चैंपियनशिप जीतने वाली भारत की पहली शटलर बनीं। विश्व चैंपियनशिप में सिंधु का यह पांचवां पदक है, इससे पहले वह दो रजत व दो कांस्य पदक जीत चुकी थीं। 
इस स्वर्ण पदक को सिंधु ने अपनी मां के लिए उपहार के रूप में समर्पित किया है क्योंकि 25 अगस्त को उनकी मां का जन्मदिन था। यह विश्व चैंपियनशिप भारत के लिए इस लिहाज से भी विशेष रही कि 36 वर्ष के अंतराल के बाद साईं प्रणीत ने भी इस प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता। गौरतलब है कि उनसे पहले प्रकाश पादुकोण ने भी पुरुष वर्ग में कांस्य पदक ही जीता था। बहरहाल, दो वर्ष (2017) पूर्व की तरह इस बार भी फाइनल में सिंधु के सामने जापान की नोजोमी ओकुहारा ही थीं। ग्लासगो में 110 मिनट चले मुकाबले में सिंधु थकान के कारण स्वर्ण से वंचित रह गई थीं। लेकिन ब्रासेल में सिंधु ने मुकाबले को पूर्णत: एकतरफा कर दिया। सिंधु ने यह मुकाबला मात्र 38 मिनट में जीत लिया। उन्होंने ओकुहारा को 21-7, 21-7 से सीधे सेटों में पराजित करते हुए इस धारणा को भी गलत साबित कर दिया कि वह बड़े फाइनल में ‘चोक’ कर जाती हैं। सिंधु को यह सफलता अपने लगातार तीसरे प्रयास में मिली है। ब्रासेल में बिल्कुल एक नई सिंधु देखने को मिली। 24 वर्षीय सिंधु का यह सफर जादुई रहा। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तीसरे चक्र में उन्होंने नौवीं रैंकिंग प्राप्त बेईवेन झांग को 21-14, 21-6 से, क्वार्टर फाइनल में दूसरी रैंकिंग प्राप्त ताई जू यिंग को 12-21, 23-12, 21-19 से और सेमी फाइनल में चौथी रैंकिंग प्राप्त चेन यू फेई को 21-7, 21-14 से पराजित किया। गौरतलब है कि 2011 में अपना कॅरियर आरंभ करने वाली सिंधु अब तक 15 खिताब जीत चुकी हैं और अप्रैल 2017 में वह विश्व में दूसरी रैंकिंग प्राप्त थीं। इस प्रतियोगिता में सिंधु न सिर्फ  जम्प स्मैश मार रही थीं बल्कि अपने पुश में भी काफी स्टीक थीं। सवाल है कि सिंधु के खेल में यह परिवर्तन कैसे आया? ऐतिहासिक विश्व चैंपियनशिप खिताब सिंधु को आसानी से नहीं मिला है। इसके लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ी है, अपने शरीर को बड़ी प्रतियोगिताओं हेतु शेप में लाने के लिए अपने शरीर पर जबरदस्त दबाव डाला। गोपीचंद अकादमी में वर्कआउट करने के बाद वह हैदराबाद के घने ट्रैफिक में लगभग 60 किमी (आना-जाना) ट्रेवल करतीं ताकि दो घंटे के लिए स्ट्रेंथ ट्रेनर श्रीकांत वर्मा मदापल्ली के अंडर ट्रेन कर सकें। यह कठिन रूटीन विश्व चैंपियनशिप से पहले 45 दिन तक जारी रहा। यह जरूरी भी था क्योंकि पूर्व में लम्बे मैचों के दौरान सिंधु की हार का कारण थकान बनती रही है। सिंधु बताती हैं, ‘मेरे पैरेंट्स मेरे पैसों का हिसाब रखते हैं। हां, जहां तक नेल आर्ट की बात है- मैं वह करती हूं जो मुझे पसंद है और मैं जो करती हूं वह मुझे पसंद है।’ सिंधु भारत की एकमात्र बैडमिंटन खिलाड़ी हैं, जिन्होंने ओलंपिक में बैडमिंटन का रजत पदक जीता है और बीडब्लूएफ  वर्ल्ड टुअर का गोल्ड मेडल जीता है, जो उन्होंने दिसम्बर 2018 में हासिल किया था। यह गोल्ड इस लिहाज से भी विशेष था कि पिछले साल सिंधु पांच प्रतियोगिताओं के फाइनल में पहुंचीं थीं, लेकिन सभी में दूसरे स्थान पर रहीं। अब ओलंपिक खेलों के लिए सिर्फ  एक वर्ष रह गया है, इसकी तैयारी के बारे में सिंधु का कहना है, ‘ओलंपिक से पहले मुझे कुछ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना है। इसलिए मैं स्टेप-बाई-स्टेप आगे बढ़ रही हूं और हर प्रतियोगिता में मैं अपना प्रदर्शन अच्छा करने का प्रयास करूंगी।  ओलंपिक क्वालीफिकेशन राउंड भी जल्द शुरू हो जायेंगे। इन सबके लिए फिट रहना महत्वपूर्ण है। यह सब आसान नहीं है, मुझे कड़ी मेहनत करनी होगी। क्वालीफिकेशन अवधि हम सब खिलाड़ियों के लिए बहुत महत्व रखती है। साथ ही हम जो कर रहे हैं उस पर फोकस बनाये रखना होता है ताकि अपनी गलतियों को दूर करें और मजबूती से वापसी करें।’

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर