अमन को एक अवसर ज़रूर दिया जाए


पहले ही बता देता हूं कि आज की बात शुरू होगी मुंशी प्रेम चंद जी से और जाकर खत्म होगी मोदी जी पर। बात शुरू करते हैं 1947 से, आज तक उस पर बहस जारी है, 72 वर्ष हो गए किसी किनारे नहीं लगी, या कोई किनारे लगाना ही नहीं चाहता या उम्मीदों के रास्ते में दीवारें बनाना चाहता है। लाखों मारे जा चुके हैं, परन्तु यह बात खत्म नहीं हुई। मामला यह है कि सरकारें बातचीत करने को तैयार ही नहीं। आखिर क्यों? एक पीढ़ी (नस्ल) 1947 का विभाजन खा गया। विभाजन के ज़ख्मों से दूसरी पीढ़ी भी अछूती न रही। तीसरी पीढ़ी 72 वर्षों में 4 युद्ध झेल चुकी है। चौथी पीढ़ी अमन का दीया जलाये बैठी है। थोड़ी-सी भी हवा तेज़ चलती है तो दीया टिमटिमाने लगता है। चौथी पीढ़ी को पता नहीं क्यों इस दीये से उम्मीद और आशाएं हैं और इससे प्यार है। वह क्यों लड़ने-मरने के स्थान पर जीना और आगे बढ़ने की बात करती है जबकि वह चारों तरफ से लड़ने और लड़ाने वालों में घिरी पड़ी है, और उससे देश भक्ति का प्रमाण-पत्र मांगा जा रहा है। आखिर क्यों? क्यों आगामी पीढ़ी चुप होकर अपने घरों में नहीं बैठ जाती? क्यों नहीं अमन के दीये को अकेला छोड़ती? वह कौन-सी शक्ति है जो उसको लड़ने के स्थान पर प्यार करने की सोच देती है? ज़रा गौर किया जाए तो साफ नज़र आएगा कि यह सोच भी वहीं पैदा हुई है जहां विभाजन डालने वाले पैदा हुए। सोचने की बात है कि एक धरती और सोचने में इतना अन्तर। एक ही देश और 2 विचारधारा, विभाजन से पूर्व और विभाजन के बाद भी। एक प्रश्न यह भी उत्पन्न होता है कि मुंशी प्रेम चंद हिन्दू थे। 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी (लंम्ही) में जन्मे और 8 अक्तूबर, 1936 को स्वर्ग सिधार गये। अर्थात मुंशी जी को याद करना ज्यादा कठिन नहीं, या उनको समझना कि वह क्या कहना चाहते थे एवं लोगों को 1947 से पूर्व क्या समझाना चाहते थे। यह समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है क्योंकि अभी उनको दुनिया से गये कुछ ही वर्ष हुए हैं परन्तु उनकी किताबें और कहानियां आज भी सभी के पास सुरक्षित हैं। प्रत्येक उनको आज भी आसानी से समझ और पढ़ सकता है, क्योंकि उन्होंने बड़ी आसान भाषा और बड़ी सादगी से वह सभी मामले और विवाद अपनी कलम की रौशनी से सुलझा दिये, जो आज भी हमारा खून पी रहे हैं। मुंशी जी साहित्य के पैतृक खिलाड़ी थे , परन्तु वह अपने समय के राजनीतिज्ञों, पंडितों और महाजनों को खूब जानते थे। मुंशी जी की ‘गो दान’ पढ़ लें या इसी नाम पर 1963 में फिल्म भी बनी थी, वह देख लें (इस फिल्म में राज कुमार, महमूद और शशि कला ने काम किया था)। आप जनता की समस्याएं, धर्म, ताकत और पैसे के दुरुपयोग को आसानी से जान जाएंगे। एक बात और समझ में आएगी कि मुंशी जी जो बात आज से 100 वर्ष पूर्व कह रहे थे हम आज भी वहीं पर खड़े हैं और उन्हीं समस्याओं के शिकार हैं और आज भी विभाजन और शोषण के शिकार हैं। धनपत राये श्रीवास्तव (मुंशी प्रेम चंद का असली नाम) को शायद ही कोई जानता हो, परन्तु मुंशी प्रेम चंद को हर कोई जानता है। आधुनिक हिन्दी-उर्दू साहित्य के कालिक मुंशी जी ने जो कुछ लिखा, निडरता से लिखा। किसी प्रणाली, समाज, पार्टी, विरोधी या धार्मिक लोगों से डर कर नहीं लिखा। खुलकर लिखा और अपने लिखे हुए पर कायम रहे। समाज को आइना ज़रूर दिखाया, उनकी गलतियां ज़रूरी बताई और खामोशी को  ज़ुबान दी। यही कारण है कि उनके वास्तविक नाम और धर्म को हर कोई भूल गया और उनका दूसरा नाम (मुंशी प्रेम चंद) इतिहास के सीने पर लिखा गया। उनकी कलम ने जो कुछ लिखा वह अमर हो गया। उप-महाद्वीप में अगर कोई उर्दू, हिन्दी लिखना, बोलना और पढ़ना जानता है, वह मुंशी प्रेम चंद जी से ज़रूर अवगत होगा। थोड़ा-बहुत पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी यह कह सकता है कि उन्होंने अगर स्वयं मुंशी जी को नहीं पढ़ा होगा तो किसी से ज़रूर उनकी तहरीर या कोई अच्छी बात सुनी होगी। मुंशी जी से मोदी तक आने तक पूरी किताब लिखनी पड़ेगी जिसमें और कई बड़े नामों और उनकी प्रशंसा (खिदमत) का ज़िक्र करना पड़ेगा। इतिहास उर्दू और हिन्दी के इन सूरमों के कारनामें कभी नहीं भूलेगा और प्रत्येक शासक को बताये कि यह लोग अपनी कलम से कौन-कौन सी उलझन सुलझा गये। रजिन्द्र सिंह बेदी, कृष्ण चंद्र, विजयदान देठा, सोमन चंद्र, प्रेम नाथ, अमृता प्रीतम, भीष्म साहनी, खगेन्द्र ठाकुर, मुल्कराज आनंद और ऐसे अन्य भी कई नाम हैं जिनको हमारा सलाम। क्योंकि ये वे लोग थे जो धरती पर आने वाली अगली पीढ़ी को अंधेरे में से निकाल कर रौशनी की तरफ लेकर आए। धर्म की सीमा को पार कर बात की और सभी भारत में पैदा हुए। सोचने वाली बात है कि इन सभी ने क्यों एक ही वृत्तांत अपनाया, क्यों मानवता की बात की। इसलिए वह सभी जानते हैं कि इस धरती पर मनुष्य और मानवता ज़िन्दा रहेगी, तभी कोई राज करेगा। अगर मनुष्य ही खत्म हो गए तो देश का वज़ूद स्वयं ही खत्म हो जाएगा। इसलिए ये सब ‘जियो और जीने दो’ की बात करते रहे, लिखते रहे, अपना काम करते रहे, विभाजन खत्म करते रहे। अब दूसरी तरफ नज़र दौड़ाई जाए। राजनीतिज्ञों ने आज तक विभाजन ही किया है और अभी भी उनकी विभाजन की सोच ठंडी नहीं हुई, आग की तरह बढ़ती जा रही है। देश में धर्म के नाम पर विभाजन, समाज का विभाजन, कारोबार का विभाजन, अमीर और गरीब का विभाजन, शहर और गांवों का विभाजन, देश के बाहर सीमाओं का विभाजन, दोस्ती और दुश्मनी के नाम पर विभाजन, व्यापार का विभाजन, किताबों का विभाजन, शख्सियतों का विभाजन, टमाटर, आलू, प्याज पर भी विभाजन, पता नहीं और कितने विभाजन डाले जाएंगे, लगता है हम खत्म हो जाएंगे परन्तु विभाजन नहीं खत्म होगा। यह वह विभाजन जिनको खत्म करने की मुंशी प्रेम चंद जी बात करते रहे परन्तु आज नरेन्द्र मोदी जी तक विभाजन नहीं खत्म हुआ। आज शाहरुख खान को भारत छोड़ जाने की बात कही जा रही है। राखी सावंत को पाकिस्तान का ध्वज उठाने पर भारत छोड़ जाने की बात कही जा रही है। आखिर क्यों? अपनी बात कहने पर पाबंदी क्यों? ज़रा गौर करें रजिन्द्र बेदी जी सिख होते हुए भी ‘रहमान के जूते’ जैसी यादगार शानदार कहानी लिख सकते हैं, अगर मुंशी प्रेम चंद जी हिन्दू होते हुए भी ‘हुज-ए-अकबर’ जैसी लाजवाब कहानी लिख सकते हैं और आज नरेन्द्र मोदी भारत और पाकिस्तान में रहने वाले करोड़ों मनुष्यों की तरक्की, खुशहाली और बेरोज़गारी के खात्मे के लिए नई ‘कहानी’ क्यों नहीं लिख सकते? अगर नई कहानी नहीं लिख सकते तो मुंशी प्रेम चंद जी कहानी जिसमें सभी से प्रेम और सभी के साथ मिल-जुल कर रहने का सबक मिलता है उस पर ही अमल कर लें। यह इतना मुश्किल काम नहीं, जिसको मोदी जी नहीं कर सकते। कहीं इतिहास यह न लिख बैठे कि अब भारत की धरती पर मुंशी प्रेम चंद जैसी सोच रखने वाले नहीं रहे। अमन को एक अवसर ज़रूर देना चाहिए।